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जीवन को सार्थक बनाती-धन्वंतरी सेवा यात्रा (उत्तर-पूर्व भारत)
डा0 योगेन्द्र मलिक

यह बात अनुभव व शोध दोनों से सुस्पश्ट है कि भारत में डाक्टर बनने के पीछे सब छात्रों में सेवा, सर्मपण तथा राश्ट्रभक्ति की भावना रहती है। परन्तु चिकित्सा महाविद्यालयों के वातावरण के कारण ये भावनाएं अंकुरित नहीं हो पाती। कुछ को कार्य करने का मंच नहीं मिलता, तो कुछ वातावरण के अनुसार ढल जाते है और कुछ यह निश्चित करते हैं कि पूर्णतः डाक्टर बनने के पश्चात ही वे अपनी भावनाओं के अनुरूप कार्य करेगें ।

मैं अपने को भाग्यवान समझता हूँ कि अपने कालेज- गुवाहाटी चिकित्सा महाविद्यालय के आरंभिक काल में ही मुझे राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के रूप में ईश्वरीय कार्य में सहभागी होने का सौभाग्य मिला। 2005 में एक दिन संदेश मिला की बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय व उत्तर-प्रदेश के कुछ चिकित्सक उत्तर-पूर्व भारत में सेवा देने के लिए आए है। मा. कृश्ण गोपाल जी, (वर्तमान-सह सर कार्यवाह-रा.स्व.संघ) ने कार्य की कल्पना रखने के साथ-2 गुवाहाटी चिकित्सा महाविद्यालय की टीम की कल्पनाओं में भी पंख लगा दिए। उत्तर-पूर्व में गरीबी के कारण स्वास्थय एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं जीवन को प्रभावित करने वाला विशय है। यह वास्तव में एक अनोखी घटना थी कि उत्तर-पूर्व भारत के विशय में फैली सब भ्रान्तियों के बावजुद तथा देश विरोधी ताकतों के प्रभाव को जानने के बाद भी ये चिकित्सक 7-10 दिन यही पर गाँवों में रहकर चिकित्सा सहायता देने वाले थे।

जिसके अन्तर्गत गत वर्शो में 19 यात्रायें पूर्ण हो चुकी है जिसमें देश-विदेश के ख्याति प्राप्त विभिन्न रोगों के विशेशज्ञ चिकित्सक एवं वरिश्ठ चिकित्सा छात्र-छात्राओं द्वारा पूर्वोत्तर के अनेक जिलों में 1117 निःशुल्क चिकित्सा शिविरों द्वारा 2708 ग्रामों के 1,99,637 महिला-पुरूश एवं बच्चों को स्वास्थ्य सेवा एवं निःशुल्क दवाईयां प्रदान की है।

मुझे आरंभ से ही इस यात्रा के साथ जुड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हर वर्श चिकित्सक तथा चिकित्सा विद्यार्थीयों की संख्या बढने लगी। अनेकों गाँव और हजारों जीवन यह यात्रा प्रभावित करने लगी। स्थानीय टीम का तीव्र गति से विकास हुआ। एक बड़ी टीम व्यवस्था देखने के लिए खड़ी हो गई। कैसे 3-5 डाक्टरों के आने से आरम्भ हुआ एक कार्य विशाल रूप लेता है, यह मेरे लिए आश्चर्य के साथ-साथ सीखने का भी अवसर था। धीरे-धीरे आसाम के बाहर भी टीमें जाने लगी। मणिपुर में सेनापति जिले में जब पहली बार यात्रा गई तो वहां मुझे जाने का सौभाग्य तथा अत्यंत विशम परिस्थितियों को जीना पड़ा।

यात्रा की समाप्ति पर अनुभव-कथन कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। देश के विभिन्न भागों जैसे उत्तर-प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, दिल्ली, बिहार, झारखण्ड, मध्यप्रदेश तथा महाराश्ट्र से आने वाले चिकित्सक एवं विद्यार्थी जब अनुभव बताते है तो भावुक हो जाते है। अपने ही देश के बन्धु वंचित है, गरीब है, फिर भी किस प्रकार अपनी संस्कृति को संजोए है, यह बात मन को छूति है। कितनी भ्रान्तियाँ उत्तर-पूर्व के विशय में फैलाई गई है उनका निवारण होता है और स्थानीय जनता को भी लगता है कि अपने देश के सुदूर भागों में भी उनकी सुध लेने वाले बैठे हैं। सभी चिकित्सकों ने अपने उदबोधन में एक संस्कृति-एक राश्ट्र, एक समाज-एवं एक जन की भावना को प्रकट करते हुए सदैव पूर्वोत्तर के साथ खडे़ रहने का संकल्प दोहराते है।

धन्वंतरी सेवा यात्रा का मुख्य उदेश्य दूरस्थ ग्रामों तक निःशुल्क चिकित्सा सुविधा देने के साथ-2 देश-विदेश से भाग लेने वाले चिकित्सकों एवं छात्रों को पूर्वोत्तर राज्यों की सप्तरंगी छटा एवं जनजाति समाज की सनातन संस्कृति, जीवन शैली तथा विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक एवं ऐतिहासिक कथा-प्रसंग एवं सामूहिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का दर्शन करना तो है ही साथ में पूर्वोत्तर राज्यों के भाई-बहनों को प्रत्यक्ष ये अनुभूति करना भी है कि पूरा देश उनके दुख-दर्द एवं अभाव में साथ खड़ा है। देश-विदेश से आने वाले चिकित्सक व छात्र दल को अनुभव होता है कि पूर्वोत्तर सामाजिक, राश्ट्रीय एवं आध्यात्मिक दृश्टि से देश के साथ एकात्म है। जिसके कारण पूर्वोत्तर एवं देश के अन्य राज्यों में एक सकारात्मक विचारों व विशयों का आदान-प्रदान होता है तथा समन्वय व समाजस्य का परिवेश निर्माण होने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह होता है।

चिकित्सा सेवाओं के साथ-साथ राश्ट्रीय भावना विकसित करने में धन्वंतरी सेवा यात्रा का अतुलनीय योगदान है। जो एक बार आता है वह आग्रह से बार-2 आना चाहता है। अपना समय, अपने पैसे से सेवा देने का यह अनूठा प्रयोग है। अपने देश के लोग कश्ट में है, गरीबी में है, स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में दुखी है, ऐसा देखकर अनेको चिकित्सक एवं विद्यार्थी अपने जीवन में सतत सेवा का व्र्रत ले चुके है। धनवन्तरी यात्रा के प्रभाव के कारण अब स्थानीय यात्राएं 10 राज्यों में चलने लगी है।

2014 की कश्मीर बाढ़ में ऋशि कश्यप स्वास्थ्य सेवा यात्रा का व्रत भी धन्वंतरी सेवा यात्रा की सफलता का प्रभाव था। ऋशि कश्यप स्वास्थ्य सेवा यात्रा भी इसी प्रकार जम्मु कश्मीर, लेह लद्दाक क्षेत्र के सुदूर गाँवों में प्रति वर्श चल रही है।

चारों धाम पथ पर स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव था। वहां भी चिकित्सकों की एक बड़ी टीम डा0 अनुज सिंघल जी के नेतृत्व व मा0 कृश्ण गोपाल जी के मार्गदर्शन में सेवा-भावना से लगी है। मैं देखता हूँ कि इन सभी कार्यो में धन्वंतरी सेवा यात्रा के समय पर जुड़े विद्यार्थी जा अब चिकित्सक बन चुके है व वरिश्ठ चिकित्सक दूर-2 से आकर सेवा देते है।

लगभग एक दशक उत्तर-पूर्व क्षेत्र में (आसाम) बीतने के कारण मेरा इस क्षेत्र के साथ एक जीवंत आत्मीय जुड़ाव, है। असीम संभावनाओं वाला यह क्षेत्र भारतीय संस्कृति को मूल रूप में संजोए है। अनेक भाशा, रूप, रहन-सहन, खान-पान, मान्यता, पहनावा आदि के बाद भी एक स्शश्ट आध्यात्मिक एकता दिखाई देती है। मेरा चिकित्सकीय जीवन यहीं बोड़ो क्षेत्र में सेवा-शिविर से आरंभ हुआ था।

अनेक सेवा कार्यो, जिनमें धनवंतरी सेवा यात्रा प्रमुख है, के कारण बदलाव की एक ब्यार उत्तर-पूर्व भारत में बहती दिखती है।

मैंने भी धनवंतरी सेवा यात्रा के द्वारा ही अपना जीवन सार्थक करने का प्रयास किया। अभी तक इसमें भाग लेने वाले डॉक्टर एवं विद्यार्थियों की संख्या हजारों में है। मैं भारत के सभी चिकित्सक बन्धुओं से निवेदन करता हूँ कि एक बार अवश्य उत्तर-पूर्व भारत के दर्शनार्थ आए तथा प्राथमिक चिकित्सा से विशेशज्ञ चिकित्सा देने की और अग्रसर धनवंतरी सेवा यात्रा में भाग लेकर अपने जीवन को सार्थक बनाएं।

धन्यवाद